सनातन धर्म में शास्त्रो ने हर मनुष्य मात्र को हर कर्म को करने की उपयुक्त समय और विधान पहले ही बना दिया था
आइये जाने कुछ क्षौर - कर्म के कुछ विधि तथा निषेध दोनों पक्ष
१- (क) श्मश्रूण्यग्रे वापयतेऽथोपकक्षावथ केशानथ लोमान्यथ नखानि। (गृह्यसूत्र)
(ख) अथैतन्मनुर्प्त्रे मिथुनमपश्यत्। स शमश्रुण्यग्रेऽवपत्। अथोपकक्षौ अथ केशान्। (तैत्तिरीय ब्राहाण)
क्षौर - कर्म या बाल कटवानेका निम्नलिखित क्रम निर्दिष्ट किया है। पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले, फिर मूंछको फिर बगल में बाल और सिरके केशको और इसके बाद अन्य रोमोंको कटवाना चाहिए। अन्त में नखों के कटवानेका विधान है।
एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, व्यतिपात, विष्टि (भद्रा), व्रतके दिन, श्राद्धके दिन और मंगल, शनिवारको क्षौरकर्म वर्जित है।
२ - भानुर्मासं क्षपयति तथा सप्त मार्तण्डसूनु भौमश्चाष्टौ वितरति शुभान् बोधन: पञ्चमासान्। सप्तैवेन्दुर्दश सुरगुरु: शुक्र एकादशेति प्राहुर्गर्गप्रभृतिमुनयः क्षौरकार्येषु नूनम्।
(वाराहीसंहिता)
क्षौरकर्म में गर्गादि मुनियोंका कथन है कि रविवारको क्षौर प्रदानसे एक मास की, शनिवार को सात मासकी और मंगलवार को आठ मास की आयु को, उस - उस दिनके अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं। इसी प्रकार बुधवारको क्षौर कराने से पाँच मास की, सोमबार को सात मास की, गुरुवार को दस मास की और शुक्रवार को ग्यारह मास की आयु की, उस - उस दिनके अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं। पुत्रेच्छु गृहस्थों और एक पुत्रवाले को सोमवार को और विद्या और लक्ष्मी के इच्छुक को गुरुवार को क्षौर नहीं कराना चाहिए।
